माधवराव सिंधिया शायद इस नाम को किसी पहचान की जरूरत नही उनका नाम भारतीय राजनीति में आदर के साथ लिया जाता है उनके जीवन मे दो स्वर्णिम अवसर ऐसे आये जहाँ गुटबाजी के चलते दो बार उन्हें मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा
पहला मामला 1989 का है जहाँ चुरहट कांड के चलते अर्जुन सिंह पर इस्तीफे का दबाव बढ़ा तो राजीव गांधी की इच्छा तत्कालीन रेलमंत्री माधवराव सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाने की थी उधर, अर्जुन सिंह इस्तीफा न देने की बात पर अड़े थे
बताया जाता है कि अंतिम समय तक सिंधिया भोपाल में अपने मुख्यमंत्री बनने का इंतजार करते रहे,
लेकिन अंतत: एक समझौते के तहत मोतीलाल वोरा को मुख्यमंत्री बना दिया गया।
हालांकि, इसके बाद राजीव गांधी अर्जुन सिंह से खासे नाराज रहे।
अर्जुन सिंह के धुर विरोधी श्यामाचरण शुक्ल को कांग्रेस में वापस ले लिया गया और वोरा के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया गया
इसके बाद अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश की राजनीति में कभी वापस नहीं आए
राजमाता की इच्छा के विरुद्ध कांग्रेस की जॉइन………
माधवराव सिंधिया ने वर्ष 1979 में अपनी मां राजमाता विजयाराजे सिंधिया के विपरीत जाकर कांग्रेस पार्टी ज्वॉइन कर ली थी
इसे लेकर राजमाता और माधवराव के बीच कटुता की खबरें आईं
मध्य प्रदेश में शुरू से ही दिग्विजय सिंह और माधवराव सिंधिया के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंदिता रही
वर्ष 1993 में जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने, उस समय माधवराव सिंधिया का नाम भी मुख्यमंत्री बनने वालों में शीर्ष पर था किन्तु, एक बार फिर एकदम से पांसे पलट गए और अर्जुन गुट ने दिग्विजय सिंह को मुख्यमंत्री बनवा दिया
सिंधिया अब दूसरी बार मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए थे।
निर्दलीय चुनाव में छूटे पसीनें…….
हालांकि, वर्ष 1971 में महज 26 साल की उम्र में माधवराव सिंधिया जनसंघ के समर्थन से लड़े थे
वर्ष 1977 में माधवराव ने निर्दलीय रूप से ग्वालियर का चुनाव लड़ा
माधवराव के लिए यह चुनाव जीतना लोहे के चने चबाने जैसा था जिसके बाद राजमाता को उनके पक्ष में अपील करनी पड़ी, तब जाकर माधवराव अकेले ऐसे प्रत्याशी थे, जो मध्य प्रदेश की 40 लोकसभा सीटों में से एक पर निर्दलीय विजयी हुए बाकी पर जनसंघ की जीत हुई।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी किताब 'न दैन्यं न पलायनम्' में लिखा है कि मां और पुत्र के बीच खाई पैदा हो गई है
वह कम से कम मुझे तो अच्छी नही लगी जब राजमाता विजयाराजे सिंधिया की मौत हुई, तब माधवराव की उनसे बातचीत बंद थी
जब वे अपनी मां के अंतिम संस्कार के लिए आए तो वहीं पर फूट-फूट कर रोने लगे तब लोगों ने उन्हें ढांढस बंधाया था।
माधव राव के साथ चार पत्रकार भी दुर्घटना में मारे गए……..
इसके बीस साल बाद 30 सिंतबर 2001 को माधवराव सिंधिया की भी एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई
इस बार 8 सीटों वालेसेसना सी-90 हवाई जहाज से माधवराव सिंधिया कानपुर में एक चुनावी सभा का संबोधित करने जा रहे थे
इस हादसे में चार पत्रकार भी मारे गए थे।
