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3 माह में 25 प्रकरण की अनिवार्यता के विरोध में,कल से मध्यप्रदेश में वकील 3 दिन की हड़ताल पर

बता दें कि पिछले 6 दिन से चली आ रही जबलपुर जिला अधिवक्ता संघ की हड़ताल के बाद मध्यप्रदेश राज्य अधिवक्ता परिषद ने भी कड़ा निर्णय लिया है। सामान्य सभा की बैठक में राज्य अधिवक्ता परिषद के पदाधिकारियों ने कहा कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा लागू की गई 3 माह में 25 प्रकरणों के निराकरण की अनिवार्यता के विरोध में प्रदेश भर में वकील 3 दिन की हड़ताल पर गए हैं।


ग्वालियर/मध्यप्रदेश।

मध्य प्रदेश में वकील अब आर-पार की लड़ाई के मूड में है। मध्य प्रदेश राज्य अधिवक्ता परिषद (Madhya Pradesh State Advocate Council) ने कड़ा निर्णय लिया है कि कल से प्रदेश के सभी वकील न्यायालयीन कामों से अलग रहकर हड़ताल करेंगे।वकीलों का विरोध 25 चिह्नित प्रकरणों को तीन माह की समयसीमा में निराकृत करने के आदेश को लेकर है।

क्या है पूरा मामला

प्राप्त जानकारी के अनुसार,स्टेट बार काउंसिल के प्रदेश अध्यक्ष प्रेम सिंह भदौरिया के मुताबिक वर्तमान में पूरे मध्यप्रदेश में 25 प्रकरणों को लेकर हाईकोर्ट ने आदेश पारित किया है। उसका पूरे प्रदेश में विरोध हो रहा है, क्योंकि यह आदेश व्यवहारिक नहीं है। इससे वकीलों को मानसिक दबाब के दौर से गुजरना पड़ रहा है।

इस आदेश से वकील और पक्षकार भारी दबाव में आ गए हैं। नियत समय-सीमा के भीतर पुराने मामले निपटाने के चक्कर में पक्षकारों को न्याय मिलने के स्थान पर महज मामलों का निपटारा होने जैसे हालत पैदा हो जाएंगे।इससे न्यायपालिका का मूलभूत उद्देश्य न्याय दान बाधित होगा। अधिवक्ताओं और पक्षकारों को अति आवश्यक होने पर भी आगामी तिथि दिए जाने की सुविधा से वंचित किया जाएगा।

इस वजह से मध्यप्रदेश राज्य अधिवक्ता परिषद 23 मार्च से 25 मार्च प्रदेश के आव्हान पर सभी वकील हड़ताल (lawyers strike) पर रहेंगे। यदि आदेश वापिस नहीं हुआ, तो 26 मार्च को फिर से बैठक बुलाई जाएंगी।जिसमें आगे की रणनीति तय होगी।

दरअसल,इस आदेश का उद्देश्य मध्य प्रदेश में निचली अदालतों में वर्षों से लाखों की संख्या में मुकदमें लंबित हैं। MP हाईकोर्ट के इस आदेश के पीछे यही मंशा थी कि 5 साल पुराने प्रकरणों का निराकरण करके लंबित मुकदमों की संख्या कम की जाए, लेकिन अब वकील इस आदेश को व्यवहारिक नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि किसी भी केस की सुनवाई के लिए कागजी खानापूर्ति में वक्त लगता है। अचानक से समय सीमा में बांधकर मुकदमे का निराकरण करना पक्षकारों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

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