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रोचक प्रसंग:खाकी शायद इसलिए भी बदनाम है,सोच और नज़रिया बादलों क्योंकि?? हम बदल रहें हैं

संपादक की कलम से…….


एक गरीब आदमी प्रतिदिन कागज़ में लिखता

हे प्रभु!! मुझे 50 हज़ार रुपये भेज दो औऱ गुब्बारे में लिखकर उडा देता। वो गुब्बारा एक पुलिस थाने के ऊपर से गुजरता ओर पुलिस कर्मी उस गुब्बारे को पकड़ कर वो पर्ची पढ़ते। और उस आदमी के भोलेपन पर हंसते एक दिन पुलिसकर्मियों ने सोचा कि क्यो ना उस गरीब आदमी की सब मिलकर मदद करें और पुलिसकर्मियों ने बहुत कोशिश की पर 25 हज़ार रुपये ही जमा कर पाए दो पुलिसकर्मी उस व्यक्ति को उसके घर जाकर 25 हज़ार रुपये दे आये।


दूसरे दिन पर्ची पढ़ी तो पुलिसकर्मियों के होश उड़े……….


दूसरे दिन पुलिसकर्मियों ने जब गुब्बारा रोक कर पर्ची पढ़ी तो उनके होश उड़ गए उसमे लिखा था।

हे प्रभु!! आपके द्वारा भेजे गए पैसे तो मिल गए लेकिन आपको पुलिसकर्मियों के साथ नही भेजने चाहिए थे कमबख्त 25 हज़ार खा गए।


सोच और नज़रिया बदलों क्योंकि??? हम बदल रहें………..


बदलते समाज में पुलिस का बदला स्वरूप नज़र आता हैं। जरूरत है बस हमें अपना नजरिया बदलने की हाँ कभी-कभी कुछ कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं इसका मतलब ये नही की हमारी मानवीय संवेदनाएँ शून्य हो चुकीं हैं। क्योंकि?? हम भी इसी समाज का एक हिस्सा हैं। इसी समाज से हमारा निर्माण होता है। कहते हैं पाँचों उंगलियां एक समान नही होती हैं। जैसे समाज में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के लोग होतें हैं उसी प्रकार “पुलिस रूपी इस महासागर में कुछ लोग मैली बूंद के समान हो सकतें हैं लेकिन इसका मतलब ये नही की पूरा महासागर ही मैला हैं” जिस दिन नजरिया बदल जायेगा अधिकारों से पहले कर्तव्य को समझेंगे उस दिन खाकी से मोहब्बत हो ही जाएगी। खाकी वर्दी वाली पुलिस को टीवी सीरियल या अन्य झूठी कहानियों से निकल कर पुलिस की वास्तविकता को भी स्वीकार करें।


जय हिंद, जय भारत………!!!!!!!!!!!!!!! 

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