दतिया/मध्यप्रदेश…………..
मध्यप्रदेश में दतिया जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर रतनगढ़ माता का मंदिर यूं तो बियाबान जंगल में है, लेकिन नवरात्रि के चलता यहां रोजाना हजारों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। यह मंदिर सोलहवीं सदी के पूर्व का है, जब राजा रतन सेन पर महमूद खिलजी ने आक्रमण किया तो उनकी बेटी मांडुला ने जौहर कर लिया था। उसके बाद लोगों ने उनका मंदिर बनवा दिया शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास भी यहां काफी समय रहे उनके बाद मंदिर की महिमा निरंतर बढ़ती गई। मान्यता है कि अगर किसी को सर्प काट ले और मां रतनगढ़ का नाम का कोई धागा बांध दे तो वह ठीक हो जाता है, लेकिन भाईदूज के मेले में सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति को यहां बंध खुलवाने यहां आना पड़ता है। चम्बल और बुन्देलखण्ड क्षेत्र में लोगों रतनगढ़ की देवी की मान्यता वैष्णो देवी के बराबर है। यही कारण है कि नवरात्रि में मां रतनगढ़ के दर्शन के लिए लाखों लोग यहां पहुंचते हैं।
इतिहास के पन्नों से………….

प्रसिद्ध रतनगढ़ माता के मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। यह मंदिर मध्य प्रदेश के दतिया जिले से 55 किलोमीटर दूर रामपुरा गांव के पास स्थित है। बीहड़ इलाका होने की वजह से यह मंदिर घने जंगल में पड़ता है। इसके बगल से ही सिंध नामक नदी बहती है। यहां अपनी मन्नतों की पूर्ति के लिए आने वाले लोग दो मंदिर के दर्शन करते हैं। एक मंदिर है रतनगढ़ माता का और दूसरा है कुंवर महाराज का मान्यताओं के अनुसार कुंवर महाराज रतनगढ़ माता के भाई हैं।

कहा जाता है कि कुंवर महाराज जब जंगल में शिकार करने जाते थे तब सारे जहरीले जानवर अपना विष बाहर निकाल देते थे। इसीलिए जब किसी इंसान को कोई विषैला जानवर काट लेता है तो उसके घाव पर कुंवर महाराज के नाम का बांध लगाते हैं। बांध लगाने के बाद वो इंसान भाई दूज (दीपावली के दूसरे दिन) के दिन कुंवर महाराज के मंदिर में दर्शन करता है और उसका पूरा विष निकल जाता है। यह मंदिर छत्रपति शिवाजी महाराज की मुगलों के ऊपर विजय कि निशानी है। पूरे भारत पर राज करने वाले मुगल शासन की सेना जब वीर मराठा शिवाजी की सेना से टकराई तो उन्हें मुंह की खानी पड़ी। मुगल सेना को परास्त करने के बाद शिवाजी ने इस मंदिर को अपनी जीत की यादगार के रूप में बनवाया था। यह मंदिर एक विजयघोष की भी याद दिलाता है। विंध्याचल के पर्वत में होने की वजह से इस मंदिर की खूबसूरती और भी बढ़ जाती है। विंध्याचल पर्वत को मां दुर्गा का निवास स्थान भी माना जाता है। इस मंदिर में विराजमान माता रतनगढ़ का भक्तों में काफी महत्व हैं। इस मंदिर को सिद्ध माना जाता है इसलिए यहां मन्नतों के पूरी होने की भी चर्चाएं काफी मशहूर हैं। यहां पर भक्त अपनी-अपनी तरह से मां को श्रद्धा प्रकट करते हैं। कोई नंगे पांव तो कोई जमीन पर लेट- लेटकर यहां आता है। और हर भक्त अपनी मुरादें पूर्ण कर अपने घर खुशियां लेकर वापस लौटता है। ऐसा माँ के हर भक्त का कहना है कि मइया अपने भक्तों का मानना है कि मइया अपने भक्तों को कभी निरीश नही करती, मइया भक्तों की हर समस्या को दूर कर उनकी मनोकामना अवश्य पूरी करती है।
