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पूर्व दस्यु सरदार दद्दा मोहर सिंह गुर्जर का निधन,जिसके नाम से कभी चंबल के बीहड़ काँपते थे

भिंड/मध्यप्रदेश…………..


भिंड में पूर्व दस्यु मोहर सिंह गुर्जर का निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे और लंबे समय से बीमार थे। वे मेहगांव में पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं और 60 के दशक में मोहर सिंह पर 2 लाख रुपए का इनाम घोषित किया गया था। पुलिस रिकॉर्ड में इन पर 315 मामले दर्ज हुए थे, जिनमें से 85 हत्याओं के मामले भी थे। सभी मामलों में वे बरी हो गए थे। अपने क्षेत्र में उन्होंने गरीब परिवार की लड़कियों का विवाह कराने के साथ कमजोर लोगों की मदद करने जैसे कई काम किए, जिसके लिए उन्हें सब मोहर दद्दा बुलाते थे। अपराध की दुनिया छोड़ने के बाद वो गरीबों की मदद और गरीब कन्याओं की शादी कराने के लिए फेमस हुए थे। पूर्व दस्यु सम्राट मोहर सिंह ने आज सुबह 9 बजे अपने निज निवास पर 92 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। चंबल में पचास के दशक में जैसे बागियों की एक पूरी बाढ़ आई थी। चम्बल में खूंखार डकैतों में एक नाम ऐसा उभरा जिसने बाकी सबको पीछे छोड़ दिया। ये नाम था मोहर सिंह का।


जिसके नाम से कभी बीह़ड कांपते थे…………….



चंबल के बीहड़ों ने जाने कितने डाकुओं को पनाह दी। सैंकड़ों गांवों की दुश्मनियां चंबल में पनपी होंगी और उन दुश्मनियों से जन्में होंगे डकैत। लेकिन एक दुश्मनी की कहानी ऐसी बनी कि उससे उपजा डकैत चंबल में आतंक का नाम बन बैठा। ऐसा डकैत जिसके पास डाकुओं की सबसे बड़ी पल्टन खड़ी हो गई।

माधौ सिंह के बाद चंबल घाटी का सबसे बड़ा नाम मोहर सिंह का था। मोहर सिंह के पास डेढ़ सौ से ज्यादा डाकू थे। चंबल घाटी में उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान की पुलिस फाइलों में उसका नाम E-1 यानि दुश्मन नंबर एक के तौर पर दर्ज था। साठ के दशक में उसका ऐसा आतंक फैल चुका था कि लोग कहने लगे थे कि चंबल में मोहर सिंह की बंदूक ही फैसला थी और मोहर सिंह की आवाज ही चंबल का कानून।

चंबल में पुलिस की रिकॉर्ड की बात करें तो 1960 में अपराध की शुरूआत करने वाले मोहर सिंह ने इतना आतंक मचा दिया था कि सब खौफ खाने लगे थे। एनकाउंटर में मोहर सिंह के साथी आसानी से पुलिस को चकमा देकर निकल जाते था। उसका नेटवर्क इतना बड़ा था कि पुलिस के चंबल में पांव रखते ही उसको खबर हो जाती थी और मोहर सिंह अपनी रणनीति बदल देता था।


लंबा आपराधिक सफर……………



1958 में पहला अपराध कर पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज होने वाले मोहर सिंह ने जब अपने कंधें से बंदूक उतारी तब तक वो ऑफिशियल रिकॉर्ड में दो लाख रुपए का इनामी हो चुका था और उसके गैंग पर 12 लाख रुपए का इनाम था। पुलिस फाइल में 315 मामले मोहर सिंह के सिर थे और 85 कत्ल का जिम्मेदार मोहर सिंह था। उसके अपराधों का एक लंबा सफर था। लेकिन अचानक ही इस खूंखार डाकू ने बंदूक रखने का फैसला कर लिया।


हथियार रख आत्मसमर्पण कर दिया……………


साठ से लेकर सत्तर के दशक तक चम्बल में दो सबसे बड़े डाकू गिरोह थे मोहर सिंह और माधो सिंह । मोहर सिंह ने 1972 में अपने गिरोह के साथ पगारा बांध पर जयप्रकाश नारायण से भेंट की और फिर 14 अप्रैल 1972 को गांधी सेवा आश्रम जौरा जिला मुरैना में अपने साथियों सहित गांधी जी की तस्वीर के सामने हथियार रखकर आत्मसमर्पण कर दिया। उस समय मोहर सिंह पर एमपी,यूपी,राजस्थान आदि राज्यो की पुलिस ने दो लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा था जिसका आज के अनुसार मूल्यांकन दस करोड़ से अधिक है। मोहर सिंह के खिलाफ देश के विभिन्न थानों में तीन सौ से अधिक हत्या के मामले दर्ज थे लेकिन बकौल मोहर सिंह ये गिनती बहुत कम थी।


आत्मसमर्पण के बाद राजनीति में रखा कदम………….



आत्मसमर्पण के बाद मोहर सिंह ने भिण्ड जिले के मेहगांव कस्बे को अपना घर बनाया और वही रहने लगे। वे दाड़ी रखाते थे इसलिए वे वहां दाढ़ी के नाम से ही विख्यात थे। वे हँसमुख और मिलनसार थे इसलिए हर उम्र के लोगों में उनकी खासी लोकप्रियता थी। यह इतनी ज्यादा थी कि वे एक बार नगर पालिका मेहगांव के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़े और निर्दलीय ही जीत गए। उंन्होने इस दौरान विकास के काम भी कराए। लोगो ने उनसे फिर चुनाव लड़ने को भी कहा तो उन्होंने मना कर दिया।


डकैत बनने की कहानी…………..



अपने समय के सबसे खूंखार डकैत मोहर सिंह के परिवार से ग्राम जटेपूरा गांव में दबंगो ने उनकी जमीन छुड़ा ली थी। और पुलिस से मिलीभगत करके उन्हें कई बार थाने में बन्द भी कराके पिटवाया भी। इसके बाद मोहर सिंह डकैत हो गया और फिर उसने अपने आतंक से पूरे उत्तर भारत को दहलाकर रख दिया। समर्पण के समय इसके गैंग में 37 लोग थे। जब मोहर सिंह गैंग ने समर्पण किया तब उसके पास सारे ऑटोमेटिक हथियार थे जो पुलिस के पास भी नही थे।


अत्याधुनिक हथियारों से लैस था गैंग…………….


समर्पण करते समय मोहर सिंह 37 साल का था । वह पूरी तरह निरक्षर था। स्कूल का मुंह भी नहीं देखा था। उसने जब समर्पण किया तो एक एसएलआर,टॉमी गन,303 बोर चार रायफल,ऑटोमेटिक  चार एलएमजी,स्टेनगन ,मार्क 5 रायफल सहित भारी असलाह गांधी के चरणों मे रखा।


जीवन पर फिल्म भी बनी…………..


मोहर सिंह और माधो सिंह कहने को तो अलग-अलग गिरोह थे लेकिन दोनों के बीच खूब याराना था । मोहर सिंह द्वारा माधो सिंह का बहुत आदर किया जाता था । दोनों गैंग ने एक साथ आत्मसमर्पण किया और फिर जेल में रहकर मुकद्दमे निपटाने के बाद ही बाहर आये। बाद में चम्बल के डाकू नाम से एक फ़िल्म भी बनी इसमें मोहर सिंह और माधो सिंह दोनों ने अपनी भूमिकाएं भी निभाई।

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